बृहस्पतिवार, 5 जनवरी 2012
बुधवार, 23 फरवरी 2011
बृहस्पतिवार, 20 जनवरी 2011
सोमवार, 3 जनवरी 2011
महिला सशक्तिकरण
महिला सशक्तिकरण
यह लेख महिलाओं की अपने अधिकारों की कानूनी लड़ाई के बारे में है। इसमें महिला अधिकार और महिला सशक्तिकरण की चर्चा है।
दुर्गा, शक्ति का रूप हैं। इतनी शक्तिमान कि भगवान राम ने भी लंका पर आक्रमण के समय, दुर्गा की आराधना की। उनकी कथा कुछ ऐसी है कि जब देवता, महिषासुर से संग्राम में हार गये और उनका ऐश्वर्य, श्री और स्वर्ग सब छिन गया तब वे दीन-हीन दशा में वे भगवान के पास पहुँचे। भगवान के सुझाव पर सबने अपनी सभी शक्तियॉं (शस्त्र) एक स्थान पर रखीं। शक्ति के सामूहिक एकीकरण से दुर्गा उत्पन्न हुई। पुराणों में उसका वर्णन है – उसके अनेक सिर हैं, अनेक हाथ हैं। प्रत्येक हाथ में वह अस्त्र-शस्त्र धारण किए हैं। सिंह, जो साहस का प्रतीक है, उसका वाहन है। ऐसी शक्ति की देवी ने महिषासुर का वध किया। वे महिषासुर मर्दनी कहलायीं।
मेरे विचार से यह कथा संघटन की एकता का महत्व बताने के लिये बतायी गयी है। शक्ति, संघटन की एकता में ही है। हमारी कथाओं में देवी दुर्गा का वर्णन है कि उनके सहस्त्र सिर और असंख्य हाथ हैं। यह वास्तव में संघटक के सहस्त्रों सिर और असंख्य हाथ हैं। साथ चलोगे तो हमेशा जीत का सेहरा बंधेगा। देवताओं को जीत तभी मिली जब उन्होने अपनी ताकत एकजुट की।
दुर्गा, शक्तिमयी हैं, उनका सशक्तिकरण हो चुका है। लेकिन आज की महिला क्या शक्तिमयी है? क्या उसका सशक्तिकरण हो चुका है? क्या वह आज दुर्गा बन चुकी है? शायद नहीं, पर उसके पास कुछ अधिकार तो हैं, वह कुछ तो शक्तिमान हुई। यह अधिकार, यह शक्तियां उसे किसी ने दिये नहीं हैं। यह उसने खुद लड़ कर प्राप्त किये हैं। आइये नजर डाले उन किस्से कहानियों पर, उस कानून पर, उन फैसलों पर, जिन्होने महिला अधिकारों को सुदृढ़ किया और कुछ हद्द तक महिलाओं को दुर्गा का रूप दिया पर सबसे पहले कुछ बातें इस महिला दिवस के बारे में।
अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आवाहन, यह दिवस सबसे पहले सबसे पहले यह २८ फरवरी १९०९ में मनाया गया। इसके बाद यह फरवरी के आखरी इतवार के दिन मनाया जाने लगा। १९१० में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन के सम्मेलन में इसे अन्तरराष्ट्रीय दर्जा दिया गया। उस समय इसका प्रमुख ध्येय महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिलवाना था क्योंकि, उस समय अधिकर देशों में महिला को वोट देने का अधिकार नहीं था।
१९१७ में रुस की महिलाओं ने, महिला दिवस पर रोटी और कपड़े के लिये हड़ताल पर जाने का फैसला किया। यह हड़ताल भी ऐतिहासिक थी। ज़ार ने सत्ता छोड़ी, अन्तरिम सरकार ने महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिये। उस समय रुस में जुलियन कैलेंडर चलता था और बाकी दुनिया में ग्रेगेरियन कैलेंडर। इन दोनो की तारीखों में कुछ अन्तर है। जुलियन कैलेंडर के मुताबिक १९१७ की फरवरी का आखरी इतवार २३ फरवरी को था जब की ग्रेगेरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन ८ मार्च थी। इस समय पूरी दुनिया में (यहां तक रूस में भी) ग्रेगेरियन कैलैंडर चलता है। इसी लिये ८ मार्च, महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
महिलाओं के अधिकारों की बात करते समय एक शब्द लैंगिक न्याय (Gender Justice) प्रयोग होता है। इस शब्द के अर्थ अलग अलग समय पर, अलग अलग देश में अलग अलग रूप में जाने जाते हैं। आइये समझें कि हमारे देश इस समय यह किस अर्थ में लिया जाता है।
यह लेख महिलाओं की अपने अधिकारों की कानूनी लड़ाई के बारे में है। इसमें महिला अधिकार और महिला सशक्तिकरण की चर्चा है।
दुर्गा, शक्ति का रूप हैं। इतनी शक्तिमान कि भगवान राम ने भी लंका पर आक्रमण के समय, दुर्गा की आराधना की। उनकी कथा कुछ ऐसी है कि जब देवता, महिषासुर से संग्राम में हार गये और उनका ऐश्वर्य, श्री और स्वर्ग सब छिन गया तब वे दीन-हीन दशा में वे भगवान के पास पहुँचे। भगवान के सुझाव पर सबने अपनी सभी शक्तियॉं (शस्त्र) एक स्थान पर रखीं। शक्ति के सामूहिक एकीकरण से दुर्गा उत्पन्न हुई। पुराणों में उसका वर्णन है – उसके अनेक सिर हैं, अनेक हाथ हैं। प्रत्येक हाथ में वह अस्त्र-शस्त्र धारण किए हैं। सिंह, जो साहस का प्रतीक है, उसका वाहन है। ऐसी शक्ति की देवी ने महिषासुर का वध किया। वे महिषासुर मर्दनी कहलायीं।
मेरे विचार से यह कथा संघटन की एकता का महत्व बताने के लिये बतायी गयी है। शक्ति, संघटन की एकता में ही है। हमारी कथाओं में देवी दुर्गा का वर्णन है कि उनके सहस्त्र सिर और असंख्य हाथ हैं। यह वास्तव में संघटक के सहस्त्रों सिर और असंख्य हाथ हैं। साथ चलोगे तो हमेशा जीत का सेहरा बंधेगा। देवताओं को जीत तभी मिली जब उन्होने अपनी ताकत एकजुट की।
दुर्गा, शक्तिमयी हैं, उनका सशक्तिकरण हो चुका है। लेकिन आज की महिला क्या शक्तिमयी है? क्या उसका सशक्तिकरण हो चुका है? क्या वह आज दुर्गा बन चुकी है? शायद नहीं, पर उसके पास कुछ अधिकार तो हैं, वह कुछ तो शक्तिमान हुई। यह अधिकार, यह शक्तियां उसे किसी ने दिये नहीं हैं। यह उसने खुद लड़ कर प्राप्त किये हैं। आइये नजर डाले उन किस्से कहानियों पर, उस कानून पर, उन फैसलों पर, जिन्होने महिला अधिकारों को सुदृढ़ किया और कुछ हद्द तक महिलाओं को दुर्गा का रूप दिया पर सबसे पहले कुछ बातें इस महिला दिवस के बारे में।
अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आवाहन, यह दिवस सबसे पहले सबसे पहले यह २८ फरवरी १९०९ में मनाया गया। इसके बाद यह फरवरी के आखरी इतवार के दिन मनाया जाने लगा। १९१० में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन के सम्मेलन में इसे अन्तरराष्ट्रीय दर्जा दिया गया। उस समय इसका प्रमुख ध्येय महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिलवाना था क्योंकि, उस समय अधिकर देशों में महिला को वोट देने का अधिकार नहीं था।
१९१७ में रुस की महिलाओं ने, महिला दिवस पर रोटी और कपड़े के लिये हड़ताल पर जाने का फैसला किया। यह हड़ताल भी ऐतिहासिक थी। ज़ार ने सत्ता छोड़ी, अन्तरिम सरकार ने महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिये। उस समय रुस में जुलियन कैलेंडर चलता था और बाकी दुनिया में ग्रेगेरियन कैलेंडर। इन दोनो की तारीखों में कुछ अन्तर है। जुलियन कैलेंडर के मुताबिक १९१७ की फरवरी का आखरी इतवार २३ फरवरी को था जब की ग्रेगेरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन ८ मार्च थी। इस समय पूरी दुनिया में (यहां तक रूस में भी) ग्रेगेरियन कैलैंडर चलता है। इसी लिये ८ मार्च, महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
महिलाओं के अधिकारों की बात करते समय एक शब्द लैंगिक न्याय (Gender Justice) प्रयोग होता है। इस शब्द के अर्थ अलग अलग समय पर, अलग अलग देश में अलग अलग रूप में जाने जाते हैं। आइये समझें कि हमारे देश इस समय यह किस अर्थ में लिया जाता है।
बुधवार, 24 मार्च 2010
युगाब्द संवत्सर का प्रथम दिन : 5111 वर्ष
आओ मनाऐं नया युगाब्द संवत्सर का प्रथम दिन : 5111 वर्ष
-विक्रमी संवत 2067
| पाश्चात्य देशों के अंधानुकरण व अंग्रेजियत के बढते प्रभाव के बावजूद भी आज चाहे बच्चे के गर्भाधान की बात हो या जन्म कीे, नामकरण की बात हो या शादी की, गृह प्रवेश की हो या व्यापार प्रारम्भ करने कीे, सभी में हम एक कुशल पण्डित के पास जाकर शुभ लग्न व मुहूर्त पूछते हैं। और तो और, देश के बडे से बडे़ राजनेता भी सत्तासीन होने के लिए सबसे पहले एक अच्छे मुहूर्त का इन्तजार करते हैं जो कि विशुद्ध रूप से विक्रमी संवत् के पंचांग पर आधारित होता है। भारतीय मान्यतानुसार कोई भी काम यदि शुभ मुहूर्त में प्रारम्भ किया जाये तो उसकी सफलता में चार चान्द लग जाते हैं। वैसे भी भारतीय संस्कृति श्रेश्ठता की उपासक है। जो प्रसंग समाज में हशZ व उल्लास जगाते हुए एक सही दिशा प्रदान करते हैं उन सभी को हम उत्सव के रूप में मनाते हैं। राश्ट्र के स्वाभिमान व देश प्रेम को जगाने वाले अनेक प्रसंग चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से जुडे़ हुए हैं। यह वह दिन है जिस दिन से भारतीय नव वशZ प्रारम्भ होता है। आइये इस दिन की महानता के प्रसंगों को देखते हैं :- |
ऐतिहासिक महत्व:
1) सृष्टि रचना का पहला दिन : आज से एक अरब 97 करोड़, 39 लाख 49 हजार 108 वशZ पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्मा जी ने जगत की रचना इसी दिन की थी।
2) प्रभु राम का राज्याभिषेक दिवस : प्रभु राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या आने के बाद राज्याभिषेक के लिये चुना।
3) नवरात्र स्थापना : शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात्, नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। प्रभु राम के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व नौ दिन उत्सव मनाने का प्रथम दिन।
4) गुरू अंगददेव जी का प्रकटोत्सव : सिख परंपरा के द्वितीय गुरू का जन्मदिवस।
5) आर्य समाज स्थापना दिवस : समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानन्द सरस्वती ने इसी दिन को आर्य समाज स्थापना दिवस के रूप में चुना।
6) सन्त झूलेलाल जन्म दिवस : सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार सन्त झूलेलाल इसी दिन प्रकट हुए।
7) डा0 हैडगेबार जन्म दिवस : राश्ट्रीय स्वयं सेवक संध के संस्थापक डा0 केशव राव बलीराम हैडगेबार का जन्मदिवस।
8) शालिवाहन संवत्सर का प्रारंभ दिवस : विक्रमादित्य की भान्ति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना।
9) युगाब्द संवत्सर का प्रथम दिन : 5111 वर्ष पूर्व युधििष्ठर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ।
2) प्रभु राम का राज्याभिषेक दिवस : प्रभु राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या आने के बाद राज्याभिषेक के लिये चुना।
3) नवरात्र स्थापना : शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात्, नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। प्रभु राम के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व नौ दिन उत्सव मनाने का प्रथम दिन।
4) गुरू अंगददेव जी का प्रकटोत्सव : सिख परंपरा के द्वितीय गुरू का जन्मदिवस।
5) आर्य समाज स्थापना दिवस : समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानन्द सरस्वती ने इसी दिन को आर्य समाज स्थापना दिवस के रूप में चुना।
6) सन्त झूलेलाल जन्म दिवस : सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार सन्त झूलेलाल इसी दिन प्रकट हुए।
7) डा0 हैडगेबार जन्म दिवस : राश्ट्रीय स्वयं सेवक संध के संस्थापक डा0 केशव राव बलीराम हैडगेबार का जन्मदिवस।
8) शालिवाहन संवत्सर का प्रारंभ दिवस : विक्रमादित्य की भान्ति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना।
9) युगाब्द संवत्सर का प्रथम दिन : 5111 वर्ष पूर्व युधििष्ठर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ।
प्राकृतिक महत्व: पतझड की समाप्ति के बाद वसन्त ऋतु का आरम्भ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है। शरद ऋतु के प्रस्थान व ग्रीश्म के आगमन से पूर्व वसन्त अपने चरम पर होता है। फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।
आघ्याित्मक महत्व :
हमारे ऋशि-मुनियों ने इस दिन के आध्याित्मक महत्व के कारण ही वशZ प्रतिपदा से ही नौ दिन तक शुद्ध-साित्वक जीवन जीकर शक्ति की आराधना तथा निर्धन व दीन दुखियों की सेवा हेतु हमें प्रेरित किया। प्रात: काल यज्ञ, दिन में विविध प्रकार के भण्डारे कर भूखों को भोजन तथा सायं-रात्रि शक्ति की उपासना का विधान है। असंख्य भक्तजन तो पूरे नौ दिन तक बिना कोई अन्न ग्रहण कर वशZभर के लिए एक असीम शक्ति का संचय करते हैं। अष्टमी या नवमीं के दिन मां दुगाZ के रूप नौ कन्याओं व एक लांगुरा (किशोर) का पूजन कर आदर पूर्वक भोजन करा दक्षिणा दी जाती है।
वैज्ञानिक महत्व :
विश्व में सौर मण्डल के ग्रहों व नक्षत्रों की चाल व निरन्तर बदलती उनकी स्थिति पर ही हमारे दिन, महीने, साल और उनके सूक्ष्मतम भाग आधारित होते हैं। इसमें खगोलीय पिण्डों की गति को आधार बनाया गया है। हमारे मनीशियों ने पूरे भचक्र अर्थात 360 डिग्री को 12 बराबर भागों में बांटा जिसे रााशि कहा गया। प्रत्येक राशि तीस डिग्री की होती है जिनमें पहली का नाम मेष है। एक राशि में सवा दो नक्षत्र होते हैं। पूरे भचक्र को 27 नक्षत्रों में बांटा गया। एक नक्षत्र 13 डिग्री 20 मिनिट का होता है तथा प्रत्येक नक्षत्र को पुन: 4 चरणों में बांटा गया है जिसका एक चरण 3 डिग्री 20 मिनिट का होता है। जन्म के समय जो राशि पूर्व दिशा में होती है उसे लग्न कहा जाता है। इसी वैज्ञानिक और गणितीय आधार पर विश्व की प्राचीनतम कालगणना की स्थापना हुई।
एक जनवरी से प्रारम्भ होने वाली काल गणना को हम ईस्वी सन् के नाम से जानते हैंं जिसका सम्बन्ध ईसाई जगत् व ईसा मसीह से है। इसे रोम के सम्राट जूलियस सीजर द्वारा ईसा के जन्म के तीन वशZ बाद प्रचलन में लाया गया। भारत में ईस्वी सम्वत् का प्रचलन अग्रेंजी शासकों ने 1752 में किया। अधिकांश राश्ट्रो के ईसाई होने और अग्रेंजों के वि“वव्यापी प्रभुत्व के कारण ही इसे वि“व के अनेक देशों ने अपनाया। 1752 से पहले ईस्वी सन् 25 मार्च से शुरू होता था किन्तु 18वीं सदी से इसकी शुरूआत एक जनवरी से होने लगी। ईस्वी कलेण्डर के महीनों के नामों में प्रथम छ: माह यानि जनवरी से जून रोमन देवताओं (जोनस, मार्स व मया इत्यादि) के नाम पर हैं। जुलाई और अगस्त रोम के सम्राट जूलियस सीजर तथा उनके पौत्र आगस्टस के नाम पर तथा सितम्बर से दिसम्बर तक रोमन संवत् के मासों के आधार पर रखे गये। जुलाई और अगस्त, क्योंकि सम्राटों के नाम पर थे इसलिए, दोनों ही इकत्तीस दिनों केे माने गये आखिर क्या आधार है इस काल गणना कार्षोर्षो यह तो ग्रहों व नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित होनी चाहिए।
ग्रेगेरियन कलेण्डर की काल गणना मात्र दो हजार वशोंZ के अति अल्प समय को दर्शाती है। जबकि यूनान की काल गणना 3579 वशZ, रोम की 2756 वशZ यहूदी 5767 वशZ, मिश्र की 28670 वशZ, पारसी 189974 वशZ तथा चीन की 96002304 वशZ पुरानी है। इन सबसे अलग यदि भारतीय काल गणना की बात करें तो हमारे ज्योतिश के अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़, 39 लाख 49 हजार 108 वशZ है। हमारे प्रचीन ग्रन्थों में एक-एक पल की गणना की गई है।
जिस प्रकार ईस्वी सम्वत् का सम्बन्ध ईसा जगत से है उसी प्रकार हिजरी सम्वत् का सम्बन्ध मुस्लिम जगत और हजरत मुहम्मद साहब से है। किन्तु विक्रमी सम्वत् का सम्बन्ध किसी भी धर्म से न हो कर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्धान्त व ब्रह्माण्ड के ग्रहों व नक्षत्रों से है। इसलिए भारतीय काल गणना पन्थ निरपेक्ष होने के साथ सृिश्ट की रचना व राश्ट्र की गौरवशाली परम्पराओं को दर्शाती है। इतना ही नहीं, ब्रह्माण्ड के सबसे पुरातन ग्रन्थ वेदों में भी इसका वर्णन है। नव संवत् यानि संवत्सरों का वर्णन यजुर्वेद के 27वें व 30वें अध्याय के मन्त्र क्रमांक क्रमश: 45 व 15 में विस्तार से दिया गया है। क्या एक जनवरी के साथ ऐसा एक भी प्रसंग जुड़ा है जिससे राष्ट्र प्रेम जाग सके, स्वाभिमान जाग सके या श्रेष्ठ होने का भाव जाग सके र्षोर्षो
कैसे मनाऐं नया साल:
नव वशZ की पूर्व संध्या पर दीप दान करें। घरों में सायंकाल 7 बजे घंटा घडियाल व शंख बजा कर मंगल ध्वनि करके इसका जोरदार स्वागत करें। भवनों व व्यावसायिक स्थलों पर भगवा पताका फहराऐं तथा द्वारों पर विक्रमी संवत 2067 की शुभ कामना सूचक वाक्य लिखें। होर्डिंग, बैनरों, बधाई पत्रों, ई-मेल व एस एम एस के द्वारा नव वशZ की बधाई व शुभ कामनाऐं प्रेषित करें। नव वशZ की प्रात: सूर्योदय से पूर्व उठकर मंगलाचरण कर सूर्य देव को प्रणाम करें, प्रभात फेरियां निकालें, हवन करें तथा एक पवित्र संकल्प लें। भारत में अनेक स्थानों पर इस दिन से नौ दिन का श्री राम महोत्सव भी मनाते हैं जिसका समापन श्री राम नवमी के दिन होता है।
तो, आइये! विदेशी को फैंक स्वदेशी अपनाऐं और गर्व के साथ भारतीय नव वर्ष यानि विक्रमी संवत् को ही मनायें तथा इसका अधिक से अधिक प्रचार करें।
आघ्याित्मक महत्व :
हमारे ऋशि-मुनियों ने इस दिन के आध्याित्मक महत्व के कारण ही वशZ प्रतिपदा से ही नौ दिन तक शुद्ध-साित्वक जीवन जीकर शक्ति की आराधना तथा निर्धन व दीन दुखियों की सेवा हेतु हमें प्रेरित किया। प्रात: काल यज्ञ, दिन में विविध प्रकार के भण्डारे कर भूखों को भोजन तथा सायं-रात्रि शक्ति की उपासना का विधान है। असंख्य भक्तजन तो पूरे नौ दिन तक बिना कोई अन्न ग्रहण कर वशZभर के लिए एक असीम शक्ति का संचय करते हैं। अष्टमी या नवमीं के दिन मां दुगाZ के रूप नौ कन्याओं व एक लांगुरा (किशोर) का पूजन कर आदर पूर्वक भोजन करा दक्षिणा दी जाती है।
वैज्ञानिक महत्व :
विश्व में सौर मण्डल के ग्रहों व नक्षत्रों की चाल व निरन्तर बदलती उनकी स्थिति पर ही हमारे दिन, महीने, साल और उनके सूक्ष्मतम भाग आधारित होते हैं। इसमें खगोलीय पिण्डों की गति को आधार बनाया गया है। हमारे मनीशियों ने पूरे भचक्र अर्थात 360 डिग्री को 12 बराबर भागों में बांटा जिसे रााशि कहा गया। प्रत्येक राशि तीस डिग्री की होती है जिनमें पहली का नाम मेष है। एक राशि में सवा दो नक्षत्र होते हैं। पूरे भचक्र को 27 नक्षत्रों में बांटा गया। एक नक्षत्र 13 डिग्री 20 मिनिट का होता है तथा प्रत्येक नक्षत्र को पुन: 4 चरणों में बांटा गया है जिसका एक चरण 3 डिग्री 20 मिनिट का होता है। जन्म के समय जो राशि पूर्व दिशा में होती है उसे लग्न कहा जाता है। इसी वैज्ञानिक और गणितीय आधार पर विश्व की प्राचीनतम कालगणना की स्थापना हुई।
एक जनवरी से प्रारम्भ होने वाली काल गणना को हम ईस्वी सन् के नाम से जानते हैंं जिसका सम्बन्ध ईसाई जगत् व ईसा मसीह से है। इसे रोम के सम्राट जूलियस सीजर द्वारा ईसा के जन्म के तीन वशZ बाद प्रचलन में लाया गया। भारत में ईस्वी सम्वत् का प्रचलन अग्रेंजी शासकों ने 1752 में किया। अधिकांश राश्ट्रो के ईसाई होने और अग्रेंजों के वि“वव्यापी प्रभुत्व के कारण ही इसे वि“व के अनेक देशों ने अपनाया। 1752 से पहले ईस्वी सन् 25 मार्च से शुरू होता था किन्तु 18वीं सदी से इसकी शुरूआत एक जनवरी से होने लगी। ईस्वी कलेण्डर के महीनों के नामों में प्रथम छ: माह यानि जनवरी से जून रोमन देवताओं (जोनस, मार्स व मया इत्यादि) के नाम पर हैं। जुलाई और अगस्त रोम के सम्राट जूलियस सीजर तथा उनके पौत्र आगस्टस के नाम पर तथा सितम्बर से दिसम्बर तक रोमन संवत् के मासों के आधार पर रखे गये। जुलाई और अगस्त, क्योंकि सम्राटों के नाम पर थे इसलिए, दोनों ही इकत्तीस दिनों केे माने गये आखिर क्या आधार है इस काल गणना कार्षोर्षो यह तो ग्रहों व नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित होनी चाहिए।
ग्रेगेरियन कलेण्डर की काल गणना मात्र दो हजार वशोंZ के अति अल्प समय को दर्शाती है। जबकि यूनान की काल गणना 3579 वशZ, रोम की 2756 वशZ यहूदी 5767 वशZ, मिश्र की 28670 वशZ, पारसी 189974 वशZ तथा चीन की 96002304 वशZ पुरानी है। इन सबसे अलग यदि भारतीय काल गणना की बात करें तो हमारे ज्योतिश के अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़, 39 लाख 49 हजार 108 वशZ है। हमारे प्रचीन ग्रन्थों में एक-एक पल की गणना की गई है।
जिस प्रकार ईस्वी सम्वत् का सम्बन्ध ईसा जगत से है उसी प्रकार हिजरी सम्वत् का सम्बन्ध मुस्लिम जगत और हजरत मुहम्मद साहब से है। किन्तु विक्रमी सम्वत् का सम्बन्ध किसी भी धर्म से न हो कर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्धान्त व ब्रह्माण्ड के ग्रहों व नक्षत्रों से है। इसलिए भारतीय काल गणना पन्थ निरपेक्ष होने के साथ सृिश्ट की रचना व राश्ट्र की गौरवशाली परम्पराओं को दर्शाती है। इतना ही नहीं, ब्रह्माण्ड के सबसे पुरातन ग्रन्थ वेदों में भी इसका वर्णन है। नव संवत् यानि संवत्सरों का वर्णन यजुर्वेद के 27वें व 30वें अध्याय के मन्त्र क्रमांक क्रमश: 45 व 15 में विस्तार से दिया गया है। क्या एक जनवरी के साथ ऐसा एक भी प्रसंग जुड़ा है जिससे राष्ट्र प्रेम जाग सके, स्वाभिमान जाग सके या श्रेष्ठ होने का भाव जाग सके र्षोर्षो
कैसे मनाऐं नया साल:
नव वशZ की पूर्व संध्या पर दीप दान करें। घरों में सायंकाल 7 बजे घंटा घडियाल व शंख बजा कर मंगल ध्वनि करके इसका जोरदार स्वागत करें। भवनों व व्यावसायिक स्थलों पर भगवा पताका फहराऐं तथा द्वारों पर विक्रमी संवत 2067 की शुभ कामना सूचक वाक्य लिखें। होर्डिंग, बैनरों, बधाई पत्रों, ई-मेल व एस एम एस के द्वारा नव वशZ की बधाई व शुभ कामनाऐं प्रेषित करें। नव वशZ की प्रात: सूर्योदय से पूर्व उठकर मंगलाचरण कर सूर्य देव को प्रणाम करें, प्रभात फेरियां निकालें, हवन करें तथा एक पवित्र संकल्प लें। भारत में अनेक स्थानों पर इस दिन से नौ दिन का श्री राम महोत्सव भी मनाते हैं जिसका समापन श्री राम नवमी के दिन होता है।
तो, आइये! विदेशी को फैंक स्वदेशी अपनाऐं और गर्व के साथ भारतीय नव वर्ष यानि विक्रमी संवत् को ही मनायें तथा इसका अधिक से अधिक प्रचार करें।
सोमवार, 28 दिसम्बर 2009
नारी! तुम श्रध्दा ही नहीं, नारायणी हो
नारी! तुम श्रध्दा ही नहीं, नारायणी हो
इतिहास में भारतीय नारी की व्यथा कथा का काफी मार्मिक ढंग से उल्लेख किया गया है. यह तथ्य तो सत्य है कि भारत में नारी को हम पूजनीय और देवी का रूप मानते हैं और हमारे शास्त्रों में तो यहाँ तक व्याख्यान मिलता है कि मातृदेवो भवः (माँ देवता होती है). वास्तव में नारी को केवल श्रद्धा कहना एक हद तक उनके अधिकारों का हनन करना ही है. कहीं न कहीं हम यह भूल जाते हैं की नारी केवल श्रद्धा ही नहीं वरन शक्ति है, हमारी जननी है , हमारा अस्तित्व है, हमारे होने का एहसास है.
मेरी माँ से लेकर पिता , पति , सास , ससुर की सीख से मैंने यही पाया कि संसार में एकमात्र सत्य केवल माँ है. वही हमें संसार से सर्वप्रथम परिचय करवाती है और उसी कि आँखों से हम संसार को देखते हैं. नारी एक नारी के रूप अनेक. मुझे देवी भगवत का यह सन्दर्भ याद आता है जहाँ देवता गन जब राक्षसों पर विजय नहीं कर पाते तो जाकर वह शक्ति की उपासना करते हैं और फिर सारे शक्तियों का संकलित रूप ही नारी (माँ शक्ति) के रूप में अवतरित होती हैं. जननी जन्म भुमिस्च स्वर्गादपि गरीयसि (जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होती है).
मैं तो देशवासियों से यह अनुग्रह करुँगी की हम सब मिलकर सरकार को कहें की वे शपथ लें कि महिला आरक्षण बिल पास करे तो लोकसभा में उन का पहला प्रस्ताव इस योजना को केवल और केवल गरीबी की रेखा से निचे रहने वाली महिलओं के लिए लागू हो , वरना ऐसा नहीं हो कि यह महिला आरक्षण बड़े नेताओं के ही परिवार वालो एवं उनकी सम्बन्धी महिलाए ही इस आरक्षण का भी अन्य आरक्षणों की तरह नेता एवं उच्चाधिकारी ही लाभ उठाते रहें और जनता को असत्य वादे करते रहें और पांच साल और बीत जाए और हमारी साधारण नारी फिर सी अगले चुनाव में वो नारियों की दुर्दशा पर फिर से रोना रोवें.
विश्व की सारी अर्थव्यवस्थाएं जो सुखी और समृद्ध हैं वहां नारीयाँ राष्ट्र की मुख्यधारा का अभिनय अंग है और पुरषों से अधिक सक्रिय हैं. आज अगर हम चीन, हांगकांग या सिंगापुर जाएँ तो वहां पुरुष कम महिलायें ज्यादा दिखाई देते हैं. हमारे देश में विल्कुल उलटी गंगा बहती है हम कहने के लिए तो नारी को सर्वोपरि कह देते हैं लेकिन उनकी दुर्गति का अंदाजा भी नहीं लगा सकते. जबकि नारी कंधे से कन्धा मिलकर और कही कही तो अधिक दायित्व भार उठाकर पुरुषो से आगे है
पिछले कुछ दिनों में नारियों की हालत में भी काफी सुधार हुआ है लेकिन अभी हमें बहूत कुछ करना बाकि है. हमें नारियों को शिक्षा, स्वास्थ और मौलिक सुभिधायों से सुसज्जित करनी पड़ेगी. हमें उन्हें हमकदम बनकर हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के काबिल बनाना होगा और इसके लिए सिर्फ चुनावी वादे नहीं बल्कि पूर्ण तन मन और धन से कार्य करना पड़ेगा.
आशा है भारत के नेताजी सुन रहे हैं...हम आपके साथ हैं अगर आप दिल से भारतीय नारियों के साथ हैं.
इतिहास में भारतीय नारी की व्यथा कथा का काफी मार्मिक ढंग से उल्लेख किया गया है. यह तथ्य तो सत्य है कि भारत में नारी को हम पूजनीय और देवी का रूप मानते हैं और हमारे शास्त्रों में तो यहाँ तक व्याख्यान मिलता है कि मातृदेवो भवः (माँ देवता होती है). वास्तव में नारी को केवल श्रद्धा कहना एक हद तक उनके अधिकारों का हनन करना ही है. कहीं न कहीं हम यह भूल जाते हैं की नारी केवल श्रद्धा ही नहीं वरन शक्ति है, हमारी जननी है , हमारा अस्तित्व है, हमारे होने का एहसास है.
मेरी माँ से लेकर पिता , पति , सास , ससुर की सीख से मैंने यही पाया कि संसार में एकमात्र सत्य केवल माँ है. वही हमें संसार से सर्वप्रथम परिचय करवाती है और उसी कि आँखों से हम संसार को देखते हैं. नारी एक नारी के रूप अनेक. मुझे देवी भगवत का यह सन्दर्भ याद आता है जहाँ देवता गन जब राक्षसों पर विजय नहीं कर पाते तो जाकर वह शक्ति की उपासना करते हैं और फिर सारे शक्तियों का संकलित रूप ही नारी (माँ शक्ति) के रूप में अवतरित होती हैं. जननी जन्म भुमिस्च स्वर्गादपि गरीयसि (जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होती है).
मैं तो देशवासियों से यह अनुग्रह करुँगी की हम सब मिलकर सरकार को कहें की वे शपथ लें कि महिला आरक्षण बिल पास करे तो लोकसभा में उन का पहला प्रस्ताव इस योजना को केवल और केवल गरीबी की रेखा से निचे रहने वाली महिलओं के लिए लागू हो , वरना ऐसा नहीं हो कि यह महिला आरक्षण बड़े नेताओं के ही परिवार वालो एवं उनकी सम्बन्धी महिलाए ही इस आरक्षण का भी अन्य आरक्षणों की तरह नेता एवं उच्चाधिकारी ही लाभ उठाते रहें और जनता को असत्य वादे करते रहें और पांच साल और बीत जाए और हमारी साधारण नारी फिर सी अगले चुनाव में वो नारियों की दुर्दशा पर फिर से रोना रोवें.
विश्व की सारी अर्थव्यवस्थाएं जो सुखी और समृद्ध हैं वहां नारीयाँ राष्ट्र की मुख्यधारा का अभिनय अंग है और पुरषों से अधिक सक्रिय हैं. आज अगर हम चीन, हांगकांग या सिंगापुर जाएँ तो वहां पुरुष कम महिलायें ज्यादा दिखाई देते हैं. हमारे देश में विल्कुल उलटी गंगा बहती है हम कहने के लिए तो नारी को सर्वोपरि कह देते हैं लेकिन उनकी दुर्गति का अंदाजा भी नहीं लगा सकते. जबकि नारी कंधे से कन्धा मिलकर और कही कही तो अधिक दायित्व भार उठाकर पुरुषो से आगे है
पिछले कुछ दिनों में नारियों की हालत में भी काफी सुधार हुआ है लेकिन अभी हमें बहूत कुछ करना बाकि है. हमें नारियों को शिक्षा, स्वास्थ और मौलिक सुभिधायों से सुसज्जित करनी पड़ेगी. हमें उन्हें हमकदम बनकर हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के काबिल बनाना होगा और इसके लिए सिर्फ चुनावी वादे नहीं बल्कि पूर्ण तन मन और धन से कार्य करना पड़ेगा.
आशा है भारत के नेताजी सुन रहे हैं...हम आपके साथ हैं अगर आप दिल से भारतीय नारियों के साथ हैं.
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